Tuesday, January 22, 2019

क्या अब दुनिया को बचाएगा शाकाहारी खाना?

दुनिया की आबादी फिलहाल लगभग 7.7 अरब है जो कि साल 2050 तक 10 अरब हो सकती है.

ऐसे में वैज्ञानिकों ने एक डाइट प्लान बनाया है जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना इतनी बड़ी आबादी के लिए भोजन की आपूर्ति की जा सके. इसे प्लेनेटरी हेल्थ डाइट कहा गया है.

इस डाइट प्लान में मांस और डेयरी उत्पादों पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. हालांकि, ये सुझाव दिया गया है कि लोगों को प्रोटीन की आपूर्ति के लिए फलियों और दालों की ओर बढ़ना चाहिए.

इस प्लान के तहत आपको अपने रोज़ाना के खानपान में से उन ज़्यादातर चीज़ों को निकालना होगा जिन्हें आप अक्सर खाते हैं. और उन चीज़ों को शामिल करना होगा जिन्हें कम खाते हैं

अगर आप हर रोज़ मांस खाते हैं तो कम करने वाली सबसे बड़ी चीज़ तो यही है.

अगर आप रेड मीट खाते हैं तो हफ़्ते में एक बर्गर और अगर जानवरों की आंतों से बनी डिश खाते हैं तो महीने में सिर्फ एक बार आपको ऐसी चीज़ें खानी चाहिए.

हालांकि, आप मछली से बने कुछ खाने का लुत्फ हफ़्ते में कई बार ले सकते हैं और हफ़्ते में एक बार ही चिकन खा सकते हैं. लेकिन इसके अलावा आपको प्रोटीन की आपूर्ति सब्जियों से करनी पड़ेगी.

शोधकर्ता दालें और फलियां खाने की सलाह देते हैं. हालांकि, स्टार्च वाली यानी कार्बोहाइड्रेट की आपूर्ति करने वाली सब्जियां जैसे आलू और अरबी की कटौती करनी होगी.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े प्रोफेसर वॉल्टर विलेट भी इस मुद्दे पर किए गए शोध में शामिल रहे हैं.

खेतों के बीच अपना बचपन बिताने वाले प्रोफेसर विलेट कहते हैं कि वह दिन में तीन बार रेड मीट खाते थे लेकिन अब उनके खाने पीने की शैली प्लेनेटरी हेल्थ डाइट के मुताबिक़ ही रही है.

विलेट अपनी इस बात को उदाहरण देकर समझाते हैं, "वहां पर खाने की चीज़ों की तमाम किस्में होती थीं. आप इन चीज़ों को अलग अलग तरह से मिलाकर कई डिश तैयार कर सकते हैं."

क्या ये डाइट प्लान एक कल्पना है?

इस योजना के तहत दुनिया के हर हिस्से में लोगों को अपने खानपान की शैली को बदलना चाहिए.

यूरोप और उत्तरी अफ़्रीका को रेड मीट में भारी कटौती करने होगी. वहीं, पूर्वी एशिया को मछली खाने में कटौती करनी होगी. अगर अफ़्रीका की बात करें तो वहां पर लोगों को स्टार्च वाली सब्जियों को खाने में कटौती करनी होगी.

स्टॉकहोम युनिवर्सिटी में स्टॉकहॉम रेज़िलेंस सेंटर की निदेशक लाइन गॉर्डन कहती हैं, "मानवता ने कभी भी अपने खानपान को इस स्तर और इस गति से बदलने की कोशिश नहीं की है. अब रही बात इसके काल्पनिक होने या न होने की, तो कल्पनाओं को नकारात्मक होने की ज़रूरत तो नहीं है. अब वो समय आ गया है जब हम एक अच्छी दुनिया बनाने की सपना देखें."

ईट-लांसेट आयोग की इस परियोजना में दुनियाभर के 37 वैज्ञानिक शामिल हैं जिनमें एग्रीकल्चर साइंटिस्ट से लेकर क्लाइमेट चेंज और न्यूट्रिशन जैसे विषयों पर शोध करने वाले विशेषज्ञ शामिल हैं.

इन लोगों ने दो सालों तक इस विषय पर शोध करने के बाद ये डाइट प्लान जारी किया है जो कि लांसेट नामक शोध जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

10 अरब लोगों के लिए खाने की ज़रूरत
साल 2011 तक दुनिया की आबादी सात अरब तक थी जो कि फिलहाल 7.7 अरब तक पहुंच गई है.

लेकिन साल 2050 तक ये आंकड़ा बढ़ कर 10 बिलियन तक पहुंच जाएगा.

शोधकर्ताओं के मुताबिक़, इस डाइट प्लान से हर साल 1.1 करोड़ लोगों को मरने से बचाया जा सकेगा.

दरअसल, इन लोगों को खराब खानपान की वजह से होने वाली बीमारियों जैसे हार्ट अटैक, हार्ट स्ट्रोक्स और कैंसर से बचाया जा सकेगा.

दुनिया के विकसित देशों में ये बीमारियों लोगों की असमय मृत्यु की सबसे बड़ी वजहों से एक है.

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