अगर टाइमिंग कोई चीज़ होती है तो यह कहने में हर्ज़ नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार को उसका कोई अंदाज़ा नहीं है.
कहने को या दिखाने को मोदी अपने समर्थकों से कहते हैं कि हर मौक़े को सही से इस्तेमाल करना चाहिए मगर रॉबर्ट वाड्रा मामले में उनकी सरकार की ओर से जो क़दम उठाए गए हैं वे ख़राब टाइमिंग के प्रमाण हैं.
अगर इसमें वाड्रा के खिलाफ़ उठे सारे या अधिकांश मामले सभी हों, तब भी वह ख़ुद को राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार बताकर सहानुभूति बटोर लेंगे.
अगर बातें एक सीमा से ज़्यादा बढ़ीं तो जिस नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े होने के कारण ये मामले ज़्यादा संवेदनशील हुए हैं, उस नेहरू गांधी को तो राजनीतिक लाभ मिलेगा ही, वाड्रा को भी फ़ायदा पहुंचेगा.
अगर इस तरह का दूसरा उदाहरण देना हो तो लालू प्रसाद यादव का उदाहरण काफ़ी बढ़िया है जो सीधे-सीधे चारा कांड में दोषी होने के बावजूद राजनीतिक सहानुभूति पा रहे हैं.
ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके परिवार के ख़िलाफ़ मामलों को सरकार ने वैसे ही हैंडल किया जिस तरह से आज वाड्रा के मामले को हैंडल किया जा रहा है.
लालू अकेले नेता हैं जिन्होंने एक ओर नरेंद्र मोदी को खुली चुनौती दी है, वहीं दूसरी ओर अदालती फैसले को राजनीतिक रंग में रंगकर ख़ुद को शहीद बताने का भी दांव चला है. उनका यह दांव कई कारणों से क़ामयाब होता भी नज़र आ रहा है.
देर क्यों हो गई?
प्रियंका गांधी के पति यानी सोनिया गांधी के दामाद यानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा पर पहली बार आरोप नहीं लगे हैं.
ख़ुद नरेंद्र मोदी 2014 की चुनावी सभाओं में वाड्रा और उनके बहाने नेहरू-गांधी परिवार के कथित 'भ्रष्टाचार' को बड़ा मुद्दा बना चुके हैं.
अभी ज़मीन के जिस मुख्य घोटाले की चर्चा है, वह नामी वकील प्रशांत भूषण के माध्यम से अरविंद केजरीवाल कब का उठा चुके थे. ख़ुद वाड्रा महाराज की जीवन शैली, कमाई का रिकॉर्ड और कामकाज की शैली शक़ को न्यौता देती रही है.
ऐसे में नरेंद्र मोदी सरकार को या उससे पहले की मनमोहन सरकार को ही कार्रवाई करनी थी तो वक़्त की कोई कमी नहीं थी. मनमोहन सरकार पर तो दामाद बाबू को बचाने का आरोप लगाया जा सकता है और मोदीजी लगाते भी रहे हैं. लेकिन इस सरकार को तो उनके ख़िलाफ़ चल रहे मामलों पर प्राथमिकता के आधार पर काम करना चाहिए था.
चुनाव के दौरान उनका देश की जनता से सबसे बड़ा वादा भ्रष्टाचार की समाप्ति और काला धन निकालना ही था. और वाड्रा को पकड़ने का मतलब सीधे-सीधे अपने सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी परिवार को राजनीतिक पटखनी देना होता.
सरकार वैसे भी भ्रष्टाचार और काला धन जैसे अपने दो प्रिय विषयों पर शोर मचाती रही है. इस क्रम में नोटबंदी से लेकर क्या-क्या किया गया, क्या क्या दावा किया गया, इन सबको गिनाने का कोई लाभ नहीं है.
पर यह नतीजा निकालने में हर्ज नहीं है कि सरकार नौ दिन चली, अढ़ाई कोस. लेकिन अब कार्यकाल के अंतिम समय में आप अगर अचानक रॉबर्ट वाड्रा पर ज़मीन खरीद, लैंड-यूज़ बदलने, वापस ज़मीन बेचकर मोटा मुनाफ़ा कमाने, कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से नाजायज़ फ़ैसले कराने और अब रक्षा सौदे में दलाली खाने जैसे मामले खोलकर सचमुच भी सही काम करने लगेंगे तो लोग उसे चुनाव से जोड़कर ही देखेंगे.
और ये राजनीतिक चालाकी सिर्फ लालू जी या मोदी जी तक सीमित नहीं है. केस, छापेमारी और अपने सहयोगियों से पूछताछ को लेकर सफ़ाई देने की जगह रॉबर्ट वाड्रा भी सबसे पहले यही कहते हैं कि उनके ख़िलाफ़ राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है.
और जिस कांग्रेस को दामाद जी के 'व्यवसाय' के मामलों से दूर रहना चाहिए, वह खुलकर मोदी सरकार के क़दम की आलोचना कर रही है. कांग्रेस के आधिकारिक प्रवक्ताओं को भी वाड्रा का बचाव करने में कोई झिझक नहीं हो रही है.
No comments:
Post a Comment